दीपावली पर्व के अवसर पर हिन्दुस्तान में घर घर में साफ सफाई का वातावरण रहता ही है, इस समय हमें श्रीमती मधु जैन, ने जबलपुर से लघुकथा भेजी है पढ़िए

 मधु जैन


गिरते मूल्य

"पता नहीं, हमारे भाग्य कब खुलेंगे और हमें ताजा हवा नसीब होगी।"
"सही कह रही हो बहना, यह सीलन भरी बदबू से तो
जीना मुश्किल हो गया है।"
"देखो न, कपड़ों की आलमारी तो दिन में दस बार खुलती है काश एक बार हमारी भी खुल जाती।"
उदासी भरे स्वर में, "मैं तो स्नेहिल स्पर्श के लिए तरस गई।"
आलमारी में बंद किताबें आपस में एक दूसरे से अपना दुखड़ा कहकर हल्कापन महसूस कर रही थीं
अरे ! सुनो..सुनो..हमारी आलमारी खुलने की बात हो रही है।" खुश होते हुए एक किताब बोली "मालकिन ने बच्चों से आलमारी खाली कर फिर से जमाने के लिए कहा है।"
"ओह...ये बच्चें कैसे हमें पटक रहे हैं, इन्हें तो हमारी कोई कद्र ही नहीं।"
"अरे...अरे..मुझे मत पटको, धीरे से रखो मैं रामायण हूँ।"
उपन्यास हंसते हुए, "बच्चों को मुझमें और तुममें अंतर बताया ही नहीं गया।" 
"चलो इसी बहाने हमारी धूल तो साफ हुई बाकी किताबें बोली।"
"ये हिन्दी की सभी कहानी ,उपन्यास रद्दी वालों को दे दो कौन पढ़ेगा इन्हें।" मालकिन की आवाज थी।
"और हां वो अंग्रेजी के नॉवेल ऊपर रख दो बच्चों के पढ़ने के काम आएंगे।"
"इन्हें भी ऊपर रख दो यह रामायण और महाभारत है दादी की है।जब वो आएगी तो पढ़ेगी।"
अब एक बार फिर आलमारी बंद हो गई, न जाने कब खुलने के लिए। किताबें उदास थी साथियों के बिछुड़ने के दुख से।"दादी के आने से रामायण, महाभारत को तो स्नेहिल स्पर्श मिल जाएगा पर हमें शायद कभी नहीं।"





मधु जैन
593 संजीवनी नगर जबलपुर
482003 म.प्र.

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