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 शुभ दिवस मित्रगण  लघुकथा विधा के पक्ष मे सुखद समाचार प्राप्त हुआ है।   समूह की सदस्या आदरणीया श्रीमती प्रेरणा गुप्ता जी का पहला लघुकथा संग्रह " सूरज डूबने से पहले" बोधि प्रकाशन से छपकर आ गया है।  उन्हे हार्दिक बधाई व शुभकामनाऐ
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  लघुकथा        कृष्णा प्यारी          बहू आँगन में बैठी अपनी साल भर की बच्ची को उबटन मल रही थी। पास ही बैठी बुआ-दादी उसे दुलार भरी दृष्टि से निहारे जा रही थीं! ज्यों ही वह उसे पुचकारती, बच्ची किलकारियाँ मारने लगती। अचानक बच्ची जोर-जोर से रोने लगी।           "अरी बहू, जरा आहिस्ता से लगा, नाजुक जान है, तू क्या उसकी खाल उधेड़ लेगी?"            बहू ने तिरछी निगाह उन पर डालते हुए कहा, "बुआजी, अब इतनी जोर से भी न लगाऊँ तो भला इसका रंग कैसे निखरेगा?"         बुआ-दादी स्नेहिल स्वर में उसे समझाते हुए बोलीं, "देख, साँवले-सलोने तो अपने श्री कृष्ण भी थे और उन्हीं के नाम पर तो मेरा नाम भी पड़ा है "कृष्णा प्यारी!" कहते हुए उनके चेहरे पर एक मधुर मुस्कान खिल आई।           बहू ने पलट कर उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा, "लेकिन, मुझे अपनी बच्ची को दूसरी 'कृष्णा प्यारी' नहीं बनाना।"               बुआ-दादी धक्क से रह गयी। वह तो क...

युवा पहल

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 असली खुशी  कुम्हार के कठोर परिश्रम से बनकर तैयार हुआ मटका अपनी वास्तविक रूप में आने के बाद खुशी से फूला नहीं समा रहा था। सुंदर आकार लिए हुए मटके को कुम्हार अपने कंधे पर रखकर बाजार की तरफ बढ़ता है। कुम्हार के कंधे पर बैठा हुआ मटका प्रफुल्लित मन से सोच रहा था कि शायद इस बार तो उसे कोई अपना खरीददार मिल ही जाएगा। क्योंकि पिछली बार वह पूरे दो महीने तक ऐसे ही रखा हुआ था। और अंत में कुम्हार ने गुस्से में आकर उसे जमीन पर दे मारा। जिससे उसके छोटे-छोटे टुकड़े उसी गीली मिट्टी में जा मिले जिससे वह बना था। कुम्हार ने मटके को चबूतरे पर रख दिया और अब मटका हर राहगीर को आशान्वित दृष्टि से देख रहा था कि आज तो उसे कोई खरीदेंगा। तभी मटके को पीछे से एक हंसी की आवाज सुनाई देती है। मटका धीरे से पीछे की ओर घूमता है। पीछे रेफ्रिजरेटरों की एक लंबी कतार थी, जो मटके को इतनी भीड़ में बिल्कुल अकेला पाकर उसकी खिल्ली उड़ा रही थी। तभी बीच में से एक रेफ्रिजरेटर ने अपनी घुनाघुनाती हुई आवाज में कहा - "अरे मटके तुम यहां बैठकर अपने खरीददारों की राह देखते हुए क्यों अपना समय बर्बाद कर रहे हो। शायद तुम्हें मालूम नही...
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    अपनों ने ही लुटा, गैरों में क्या दम था।    उदय श्री  
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  लघुकथा   लघुकथा              'वह' अनमना सा  कहीं से आकर पार्क की बेंच पर बैठ गया था।  'वह' बहुत नाराज़ दिखाई पड़ रहा था।  कुछ अपने से कुछ दुसरो से भी।  उसे सिर में दर्द तो नहीं था। फिर भी वह बार बार माथे को दबा रहा था।  उसने कोई विशेष दवाईयां भी नहीं  ली थी।  उसके सारे कार्य में हाथों की भूमिका अहम थी। ख़ासतौर पर उंगलियां।  लोगों ने कहा : "किसी 'वायरस' का प्रकोप है।"  उदय श्री ताम्हणे  भोपाल मध्यप्रदेश भारत   

दीपावली पर्व के अवसर पर हिन्दुस्तान में घर घर में साफ सफाई का वातावरण रहता ही है, इस समय हमें श्रीमती मधु जैन, ने जबलपुर से लघुकथा भेजी है पढ़िए

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  मधु जैन गिरते मूल्य "पता नहीं, हमारे भाग्य कब खुलेंगे और हमें ताजा हवा नसीब होगी।" "सही कह रही हो बहना, यह सीलन भरी बदबू से तो जीना मुश्किल हो गया है।" "देखो न, कपड़ों की आलमारी तो दिन में दस बार खुलती है काश एक बार हमारी भी खुल जाती।" उदासी भरे स्वर में, "मैं तो स्नेहिल स्पर्श के लिए तरस गई।" आलमारी में बंद किताबें आपस में एक दूसरे से अपना दुखड़ा कहकर हल्कापन महसूस कर रही थीं अरे ! सुनो..सुनो..हमारी आलमारी खुलने की बात हो रही है।" खुश होते हुए एक किताब बोली "मालकिन ने बच्चों से आलमारी खाली कर फिर से जमाने के लिए कहा है।" "ओह...ये बच्चें कैसे हमें पटक रहे हैं, इन्हें तो हमारी कोई कद्र ही नहीं।" "अरे...अरे..मुझे मत पटको, धीरे से रखो मैं रामायण हूँ।" उपन्यास हंसते हुए, "बच्चों को मुझमें और तुममें अंतर बताया ही नहीं गया।"  "चलो इसी बहाने हमारी धूल तो साफ हुई बाकी किताबें बोली।" "ये हिन्दी की सभी कहानी ,उपन्यास रद्दी वालों को दे दो कौन पढ़ेगा इन्हें।" मालकिन की आवाज थी। "और हां वो ...