युवा पहल
असली खुशी कुम्हार के कठोर परिश्रम से बनकर तैयार हुआ मटका अपनी वास्तविक रूप में आने के बाद खुशी से फूला नहीं समा रहा था। सुंदर आकार लिए हुए मटके को कुम्हार अपने कंधे पर रखकर बाजार की तरफ बढ़ता है। कुम्हार के कंधे पर बैठा हुआ मटका प्रफुल्लित मन से सोच रहा था कि शायद इस बार तो उसे कोई अपना खरीददार मिल ही जाएगा। क्योंकि पिछली बार वह पूरे दो महीने तक ऐसे ही रखा हुआ था। और अंत में कुम्हार ने गुस्से में आकर उसे जमीन पर दे मारा। जिससे उसके छोटे-छोटे टुकड़े उसी गीली मिट्टी में जा मिले जिससे वह बना था। कुम्हार ने मटके को चबूतरे पर रख दिया और अब मटका हर राहगीर को आशान्वित दृष्टि से देख रहा था कि आज तो उसे कोई खरीदेंगा। तभी मटके को पीछे से एक हंसी की आवाज सुनाई देती है। मटका धीरे से पीछे की ओर घूमता है। पीछे रेफ्रिजरेटरों की एक लंबी कतार थी, जो मटके को इतनी भीड़ में बिल्कुल अकेला पाकर उसकी खिल्ली उड़ा रही थी। तभी बीच में से एक रेफ्रिजरेटर ने अपनी घुनाघुनाती हुई आवाज में कहा - "अरे मटके तुम यहां बैठकर अपने खरीददारों की राह देखते हुए क्यों अपना समय बर्बाद कर रहे हो। शायद तुम्हें मालूम नही...