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नवंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

युवा पहल

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 असली खुशी  कुम्हार के कठोर परिश्रम से बनकर तैयार हुआ मटका अपनी वास्तविक रूप में आने के बाद खुशी से फूला नहीं समा रहा था। सुंदर आकार लिए हुए मटके को कुम्हार अपने कंधे पर रखकर बाजार की तरफ बढ़ता है। कुम्हार के कंधे पर बैठा हुआ मटका प्रफुल्लित मन से सोच रहा था कि शायद इस बार तो उसे कोई अपना खरीददार मिल ही जाएगा। क्योंकि पिछली बार वह पूरे दो महीने तक ऐसे ही रखा हुआ था। और अंत में कुम्हार ने गुस्से में आकर उसे जमीन पर दे मारा। जिससे उसके छोटे-छोटे टुकड़े उसी गीली मिट्टी में जा मिले जिससे वह बना था। कुम्हार ने मटके को चबूतरे पर रख दिया और अब मटका हर राहगीर को आशान्वित दृष्टि से देख रहा था कि आज तो उसे कोई खरीदेंगा। तभी मटके को पीछे से एक हंसी की आवाज सुनाई देती है। मटका धीरे से पीछे की ओर घूमता है। पीछे रेफ्रिजरेटरों की एक लंबी कतार थी, जो मटके को इतनी भीड़ में बिल्कुल अकेला पाकर उसकी खिल्ली उड़ा रही थी। तभी बीच में से एक रेफ्रिजरेटर ने अपनी घुनाघुनाती हुई आवाज में कहा - "अरे मटके तुम यहां बैठकर अपने खरीददारों की राह देखते हुए क्यों अपना समय बर्बाद कर रहे हो। शायद तुम्हें मालूम नही...
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    अपनों ने ही लुटा, गैरों में क्या दम था।    उदय श्री  
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  लघुकथा   लघुकथा              'वह' अनमना सा  कहीं से आकर पार्क की बेंच पर बैठ गया था।  'वह' बहुत नाराज़ दिखाई पड़ रहा था।  कुछ अपने से कुछ दुसरो से भी।  उसे सिर में दर्द तो नहीं था। फिर भी वह बार बार माथे को दबा रहा था।  उसने कोई विशेष दवाईयां भी नहीं  ली थी।  उसके सारे कार्य में हाथों की भूमिका अहम थी। ख़ासतौर पर उंगलियां।  लोगों ने कहा : "किसी 'वायरस' का प्रकोप है।"  उदय श्री ताम्हणे  भोपाल मध्यप्रदेश भारत   

दीपावली पर्व के अवसर पर हिन्दुस्तान में घर घर में साफ सफाई का वातावरण रहता ही है, इस समय हमें श्रीमती मधु जैन, ने जबलपुर से लघुकथा भेजी है पढ़िए

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  मधु जैन गिरते मूल्य "पता नहीं, हमारे भाग्य कब खुलेंगे और हमें ताजा हवा नसीब होगी।" "सही कह रही हो बहना, यह सीलन भरी बदबू से तो जीना मुश्किल हो गया है।" "देखो न, कपड़ों की आलमारी तो दिन में दस बार खुलती है काश एक बार हमारी भी खुल जाती।" उदासी भरे स्वर में, "मैं तो स्नेहिल स्पर्श के लिए तरस गई।" आलमारी में बंद किताबें आपस में एक दूसरे से अपना दुखड़ा कहकर हल्कापन महसूस कर रही थीं अरे ! सुनो..सुनो..हमारी आलमारी खुलने की बात हो रही है।" खुश होते हुए एक किताब बोली "मालकिन ने बच्चों से आलमारी खाली कर फिर से जमाने के लिए कहा है।" "ओह...ये बच्चें कैसे हमें पटक रहे हैं, इन्हें तो हमारी कोई कद्र ही नहीं।" "अरे...अरे..मुझे मत पटको, धीरे से रखो मैं रामायण हूँ।" उपन्यास हंसते हुए, "बच्चों को मुझमें और तुममें अंतर बताया ही नहीं गया।"  "चलो इसी बहाने हमारी धूल तो साफ हुई बाकी किताबें बोली।" "ये हिन्दी की सभी कहानी ,उपन्यास रद्दी वालों को दे दो कौन पढ़ेगा इन्हें।" मालकिन की आवाज थी। "और हां वो ...
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  लघुकथा   कन्यादान                विवाह तो दो आत्माओं का मिलन होता है, जो जीवनपर्यंत हर सुख-दुख  में साथ निभाते हैं, फिर इसमें कन्यादान जैसी रस्म का औचित्य क्यों...?              शुभ मुहूर्त निकला जा रहा है, पंडित जी की आवाज़ में अब रोष झलकने लगा था।             पंडित जी, आप अपने रीति-रिवाज निभाएं, उससे पूर्व मैं अपनी एक शर्त  रखना चाहता हूँ, बड़ो-बुजुर्गों की तरफ बिना  देखे ही आकाश निःसंकोच बीच में  बोल पड़ा।                दुल्हे के मुँह से ऐसा सुनते ही मेहमानों से भरा मंडप सूई पटक  सन्नाटे में परिवर्तित हो गया। ठंड में ठिठुरते हुए बदन से पसीने की बूँदे  छलकने लगीं।            बेसुध से होते पिता को भाई ने सहारा दिया और हिम्मत करके पूछा- "बताओ क्या चाहिए तुमको, जो अब इस समय पर तुमको अपनी शर्त याद आयी?"           माँ-पिता की दयनीय स्थिति अब...

गिलहरी और मुंगफली

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 गिलहरी और मूँगफली  उदय श्री. ताम्हणे 'श्रीमान जी!  अभी मुझे आधा घंटा लगेगा आपके पास पहुँचने में! तब तक इंतजार कीजिये !' उधर से आवाज आई तो मोबाईल बंद कर मैं पार्क की ओर बढ़ गया! 'टाइम पास मूंगफली…ऽ…!'  गेट के सामने ही खड़ा मूँगफलीवाला आवाज लगा रहा था! उसने कागज के बहुत सारे कोन बनाकर उनमें मूंगफलियाँ भर रखी थीं ! एक कोन तो उसने दायें हाथ में इस तरह थाम रखा था, जैसे स्वागतातुर व्यक्ति फूलों का गुलदस्ता थामे रहता है! ट्रेन में, बस में, सिनेमा हॉल में मूंगफली बहुत साथ देती है! चलो, इसकी भी कुछ बिक्री हो जाय! …मैंने सोचा और २० रुपये का नोट निकालकर उसकी ओर बढ़ाया, 'लो भाई!' मूंगफली का वह गुलदस्तानुमा कोन उसने मुझे पेश कर दिया!  उसे ले, बेँच पर आ बिखरी फव्वारे की बूँदों को बाएं हाथ से पोंछकर मैं उस पर बैठ गया! कोन से निकालकर पहली मूंगफली को छीलना शुरू किया। अचानक एक दाना चुटकी से छिटककर जमीन पर लुढक गया! उसे देख, पीछे खड़े पेड़ से गिलहरी नीचे उतर आई और अगले पैरों का हाथों की तरह उपयोग करते हुए बड़े चाव से दाना खाने लगी!  कुतूहल जागा! मैंने छिलकायुक्त मूंगफली उसकी ओर लु...

लघुकथा : धन्ना का पडौसी

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  लघुकथा  धन्ना का पड़ोसी       सब्जीवाला आ....$.... ये आवाज़ सुनकर धन्ना अपनी बालकनी में आकर खड़ा हो जाता है।       धन्ना उससे सब्ज़ी तो नहीं लेता पर थोड़ा उसका मनोरंजन  हो जाता है।  धन्ना का पड़ोसी जोशी अक्सर उससे सब्ज़ी खरीदता है।      प्याज की तरह गोभी, भिंडी, मटर और टमाटर के भाव भी कम तो नहीं थे, वैसे भी मोल भाव तो करना ही है। सो धन्ना के पड़ोसी ने पूछा गोभी -मटर कैसे दिए। सब्ज़ीवाले ने कहा ६० रूपये किलो। धन्ना के पड़ोसी ने कहा अबे क्या सरकार की तरह तू भी टैक्स लगाकर हमे लूटेगा। ३० रूपये किलो देना हो तो दे वर्ना चलता हो। सब्जी वाला गिड़गिड़ाया साहब २५ किलोमीटर से गाडीभाडा देकर सब्ज़ी लाता हूं। इतना कम में तो नहीं पुरायेगा। पडौसी बोला ३५ रूपये से ऊपर १ रुपया न दूंगा। सब्जी न बिकी तो घर की रोटी कैसे बनेगी सो सब्जी वाला मन गया। पड़ोसी ने एक -एक किलो गोभी, मटर और टमाटर अच्छे छांटकर तुलवा लिए। १०५ रूपये हुए। पड़ोसी ने १०० रूपये का नोट सब्जीवाले के हाथ पर रख दिया कहा छुट्टे नहीं है ५ रूपये बाद में लेना। सब्जीवाला रवाना हो गया।...

लघुकथा : दारुण

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लघुकथा  दारुण  उदय श्री. ताम्हणे  पर्व विशेष पर भव्य हवन समारोह का आयोजन किया गया था ! बड़े -बड़े हवन कुंड बनाये गये थे !  पंडित जी महाराज लगातार मंत्रोच्चार कर रहे थे ! जजमान जोड़ो मे बैठ कर हवन कुंड मे आहुतियाँ डाल रहे थे !  ॐ स्वाहा की ध्वनि गूंज रही थी ! वातावरण मे सुगंध फैलती जा रही थी !  सहसा मंत्रोच्चार का स्वर धीमा हुआ ! विद्धुत कर्मी लपका उसने माइक्रोफोन मे कुछ किया आवाज फिर बढ़ गयी !  पंडाल मे ऊर्जा बढ़ गयी थी ! जो आहुतियाँ नहीं डाल पाये थे, वे लालायित थे ! स्वाहा ! स्वाहा ! स्वाहा ! की तरंगो के साथ हवन निर्विध्न सम्पन्न हुआ !             अब जोड़े अपने स्थान से उठने लगे थे ! कोई पानी की जुगाड़ मे था, कोई कमर सीधी कर रहा था, कोई पैरो की झुन - झुनी हटा रहा था !  तभी कई चीखे गूंजी! कुछ बच्चे हवन कुंड के पास खेल रहे थे, और उनमे से एक बच्चा हवन मे गिर गया था !  सुरक्षा कर्मी दौड़े उन्होने बच्चे को बाहर निकाला और डाक्टर के पास ले गये ! डाक्टर ने जवाब दे दिया था ! उदय श्री ताम्हणे  भोपाल मध्यप्रदेश भारत ‌
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    लघुकथा    उदय श्री ताम्हणे  असमंजस   "ताजा खबर, अख़बार ले लो सेठ जी!"   "ठीक है। एक रुपया दूंगा! "   "दो रूपये का है!"   "मै जानता हूँ, तुझे तो ये कंपनी से मुफ़्त मिलते है!"   "तू कामचोरी तो नहीं कर रहा सो ले लेता हूँ, वार्ना लेता भी नहीं!"   "एक रुपया लेकर, अख़बार देकर लड़का चलता बना"  अख़बार लिया है तो पढ़ना भी चाहिए ....  ....... न!  पहला पेज उप चुनाव में सत्ता पक्ष की करारी हार!  दूसरा पेज असहिष्णुता पर प्रदर्शन!  तीसरा पेज एटीएम से गिरोह ने रूपये निकाल लिए!  चौथा पेज महिला का मंगलसूत्र ले कर भागे लुटेरे!  सेठ का मन कसेला हो गया ,अख़बार को मोड़कर वह बुदबुदाया क्यों ले लिया मैने यह अखबार! 
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  मितव्ययता  बाबूजी ने डाक में आया लिफाफा खोल कर पत्र पढ़ा ! पत्र पढ़कर बाबूजी ने कागज का नीचे का कोरा हिस्सा काट लिया ! यह देखकर पास में बैठा उनका बालक कौतुहल वश पूछ बैठा " बाबूजी ये कागज का आधा हिस्सा आपने क्यों काट लिया ? " बाबूजी ने बताया " इस कोरे बचे हुए कागज पर अब मै पत्र का उत्तर लिखूंगा ! बालक समझ गया कि बाबूजी उसकी किताब - कापियों का खर्च कैसे चलाते है !   * उदय श्री. ताम्हणे 
 ********** मितव्ययता ******* बाबूजी ने डाक में आया लिफाफा खोल कर पत्र पढ़ा ! पत्र पढ़कर बाबूजी ने कागज का नीचे का कोरा हिस्सा काट लिया ! यह देखकर पास में बैठा उनका बालक कौतुहल वश पूछ बैठा " बाबूजी ये कागज का आधा हिस्सा आपने क्यों काट लिया ? " बाबूजी ने बताया " इस कोरे बचे हुए कागज पर अब मै पत्र का उत्तर लिखूंगा ! बालक समझ गया कि बाबूजी उसकी किताब - कापियों का खर्च कैसे चलाते है !   * उदय श्री. ताम्हणे 

ॐ श्री गणेशाय नमः

 जय श्री गणेश  श्री एकवीरा देवी नमः  श्री खंडोबा नमः  श्री बहिरोबा नमः  जय हनुमानजी  जय श्री राम  श्री राधे गोविन्द