युवा पहल
असली खुशी
कुम्हार के कठोर परिश्रम से बनकर तैयार हुआ मटका अपनी वास्तविक रूप में आने के बाद खुशी से फूला नहीं समा रहा था। सुंदर आकार लिए हुए मटके को कुम्हार अपने कंधे पर रखकर बाजार की तरफ बढ़ता है। कुम्हार के कंधे पर बैठा हुआ मटका प्रफुल्लित मन से सोच रहा था कि शायद इस बार तो उसे कोई अपना खरीददार मिल ही जाएगा। क्योंकि पिछली बार वह पूरे दो महीने तक ऐसे ही रखा हुआ था। और अंत में कुम्हार ने गुस्से में आकर उसे जमीन पर दे मारा। जिससे उसके छोटे-छोटे टुकड़े उसी गीली मिट्टी में जा मिले जिससे वह बना था। कुम्हार ने मटके को चबूतरे पर रख दिया और अब मटका हर राहगीर को आशान्वित दृष्टि से देख रहा था कि आज तो उसे कोई खरीदेंगा।
तभी मटके को पीछे से एक हंसी की आवाज सुनाई देती है। मटका धीरे से पीछे की ओर घूमता है। पीछे रेफ्रिजरेटरों की एक लंबी कतार थी, जो मटके को इतनी भीड़ में बिल्कुल अकेला पाकर उसकी खिल्ली उड़ा रही थी।
तभी बीच में से एक रेफ्रिजरेटर ने अपनी घुनाघुनाती हुई आवाज में कहा - "अरे मटके तुम यहां बैठकर अपने खरीददारों की राह देखते हुए क्यों अपना समय बर्बाद कर रहे हो। शायद तुम्हें मालूम नहीं है कि अब लोगों को तुम्हारी जरूरत नहीं है। बल्कि अब तो लोग हम हजारों रुपए वाले रेफ्रिजरेटरों को खरीदकर ले जाते हैं। और तुम्हारा पानी अब लोगों को इतनी शीतलता प्रदान नहीं करता है। जितना कि हम रेफ्रिजरेटरो का कोल्ड पानी।"
तभी मटके नेताओं अपनी मीठी आवाज में कहता है कि - "लेकिन रेफ्रिजरेटर भाई तुम शायद भूल रहे हो। जब तुम्हारा वजूद भी इस दुनिया में नहीं था। तब मेरा ही पानी पहले के लोगों को शीतलता प्रदान कर राहत पहुंचाता था।"
इसी बीच आखिरी में खड़ा हुआ एक रेफ्रिजरेटर अपनी तनतनाती हुई आवाज में कहता है कि - "रे मटके अब जमाना बदल गया है। अब पहले वाले लोग नहीं है यहां, जो तुझे अपने घर खरीदकर ले जायेंगे। आजकल की युवा पीढ़ी की तो एकमात्र पसंद हम रेफ्रिजरेटर हैं। अधिकतर बच्चे तो जानते भी नहीं कि सच में क्या अब भी तेरा अस्तित्व है।"
यह कहते हुए पुनः सारे रेफ्रिजरेटर खिलखिलाकर हंस पड़े।
तभी एक छोटा- सा बच्चा कुम्हार से आकर मटके के दाम पूछकर मटके को थोड़ा घुमा- फिरा कर देखा। अपनी जेब में से एक मैला- सा पचास रुपये का नोट निकालकर कुम्हार को दिया है और मटके को अपने कंधे पर रखकर आगे बढ़ गया।
कंधे पर बैठा हुआ मटका जोर से बोला - "देखो रेफ्रिजरेटरों गरीबों के घर की शान तो आज भी मैं ही हूँ। और मेरा शीतल जल केवल मन को शांति ही नहीं देता बल्कि। बल्कि मेरी मिट्टी में मौजूद कई तत्व लोगों को बीमारी से लड़ने की ताकत भी प्रदान करते हैं।"
यह कहते हुए मटका जोर से हँसा है और रेफ्रिजरेटरों की लंबी कतारों का सिर नीचे झुक गया।
परिचय-
नेहा शर्मा
माता-मंजू शर्मा
पिता- कृष्ण कुमार शर्मा
जन्मतिथि- 15 फरवरी 2002
शिक्षा- स्नातक में अध्ययनरत।
प्रकाशित रचनाएँ- शब्द सरोकार (पटियाला, पंजाब), जगमगदीप ज्योति (अलवर, राजस्थान), शुभ तारिका (अम्बाला, पंजाब), हरियाणा प्रदीप (गुरुग्राम, हरियाणा),वूमेन एक्सप्रेस (दिल्ली), स्वैच्छिक दुनिया (कानपुर), नारी अस्मिता (वडोदरा, गुजरात),लघुकथा कलश तृतीय महाविशेषांक (पटियाला, पंजाब), लघुकथा कलश रचना प्रक्रिया विशेषांक, सेतु पत्रिका (पिट्सबर्ग, अमेरिका), हम हिन्दुस्तानी(USA), अनुभव पत्रिका, वर्तमान अंकुर (दिल्ली), जयदीप पत्रिका, कर्म कसौटी (कानपुर उत्तरप्रदेश), हरिगन्धा, विजय दर्पण टाईम्स, अहिंद के क्षेत्र में हिन्दी का प्रचार प्रसार पत्रिका, कलम लाइव पत्रिका, मातृभाषा (इंदौर मध्यप्रदेश), रचनाकार , मातृभारती प्रतिलिपि (बेंगलुरु)।
प्राप्त पुरस्कार -
शुभ तारिका से प्राप्त "श्रद्धा पुरस्कर"।
मातृभारती से "माई वीडियो स्टोरी कॉम्पिटिशन" में प्राप्त पुरस्कार।
"मोरल स्पर्धा" में प्राप्त पुरस्कार।
"काव्योत्सव2.0" में प्राप्त पुरस्कार।
मातृभारती द्वारा आयोजित दैनिक प्रतियोगिता में प्राप्त पुरस्कार।
प्रतिलिपि द्वारा आयोजित प्रतियोगिता "प्रतिलिपि कथा सम्मान" में प्राप्त सर्टिफिकेट ।
- साझा संकलन "लघुकथा मंजूषा" प्रकाशित ।
पता- बीजवाड़ चौहान
अलवर, राजस्थान
पिनकोड़- 301401
सम्पर्क सूत्र- 9571364626
Email- sharmaneha7832@gmail.com

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