गिलहरी और मुंगफली
गिलहरी और मूँगफली
उदय श्री. ताम्हणे
'श्रीमान जी!
अभी मुझे आधा घंटा लगेगा आपके पास पहुँचने में! तब तक इंतजार कीजिये !' उधर से आवाज आई तो मोबाईल बंद कर मैं पार्क की ओर बढ़ गया!
'टाइम पास मूंगफली…ऽ…!'
गेट के सामने ही खड़ा मूँगफलीवाला आवाज लगा रहा था! उसने कागज के बहुत सारे कोन बनाकर उनमें मूंगफलियाँ भर रखी थीं ! एक कोन तो उसने दायें हाथ में इस तरह थाम रखा था, जैसे स्वागतातुर व्यक्ति फूलों का गुलदस्ता थामे रहता है!
ट्रेन में, बस में, सिनेमा हॉल में मूंगफली बहुत साथ देती है! चलो, इसकी भी कुछ बिक्री हो जाय!
…मैंने सोचा और २० रुपये का नोट निकालकर उसकी ओर बढ़ाया, 'लो भाई!' मूंगफली का वह गुलदस्तानुमा कोन उसने मुझे पेश कर दिया!
उसे ले, बेँच पर आ बिखरी फव्वारे की बूँदों को बाएं हाथ से पोंछकर मैं उस पर बैठ गया!
कोन से निकालकर पहली मूंगफली को छीलना शुरू किया। अचानक एक दाना चुटकी से छिटककर जमीन पर लुढक गया! उसे देख, पीछे खड़े पेड़ से गिलहरी नीचे उतर आई और अगले पैरों का हाथों की तरह उपयोग करते हुए बड़े चाव से दाना खाने लगी!
कुतूहल जागा! मैंने छिलकायुक्त मूंगफली उसकी ओर लुढ़का दी! उस मूंगफली को मुँह में दबाकर वह भागी और पेड़ की शाखा पर जाकर बैठ गई!
तब आराम उसका छिलका कुतर-कुतरकर दाने को खाने लगी! उसे खा लेने के बाद वह पेड़ से नीचे उत्तर आई!
इस बार मैंने उसे दाने ही दिये। उसने वहीं बैठकर उन्हें खाया! उसे खत्म कर, वह ललचाई दॄष्टि से मुझे निहारने लगी! मैंने छिलकायुक्त एक मूँगफली उसके सामने रखी!
अरे रे! यह क्या? मूँगफली लेकर वह फिर पेड़ पर जा चढ़ी और उसी डाल पर बैठकर उसे कुतर-कुतर खाने लगी!
अब तो यह क्रम ही बन गया! वह निडर होकर मेरे निकट आती, मैं मूँगफली का दाना उसे देता तो वह वहीं बैठकर खाती, और छिलकायुक्त मूँगफली देता तो उसे लेकर पेड़ की शाख पर जा बैठती। आराम से छील-छीलकर उसे खाती!
गिलहरी भी जानती है कि मूँगफली ‘टाइम पास’ आइटम है, उसे छीलकर खाने में समय लगता है! वह खतरा मोल लेना नहीं चाहती।
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश भारत

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