लघुकथा       


कृष्णा प्यारी

         बहू आँगन में बैठी अपनी साल भर की बच्ची को उबटन मल रही थी। पास ही बैठी बुआ-दादी उसे दुलार भरी दृष्टि से निहारे जा रही थीं! ज्यों ही वह उसे पुचकारती, बच्ची किलकारियाँ मारने लगती। अचानक बच्ची जोर-जोर से रोने लगी।

          "अरी बहू, जरा आहिस्ता से लगा, नाजुक जान है, तू क्या उसकी खाल उधेड़ लेगी?"

           बहू ने तिरछी निगाह उन पर डालते हुए कहा, "बुआजी, अब इतनी जोर से भी न लगाऊँ तो भला इसका रंग कैसे निखरेगा?"

        बुआ-दादी स्नेहिल स्वर में उसे समझाते हुए बोलीं, "देख, साँवले-सलोने तो अपने श्री कृष्ण भी थे और उन्हीं के नाम पर तो मेरा नाम भी पड़ा है "कृष्णा प्यारी!" कहते हुए उनके चेहरे पर एक मधुर मुस्कान खिल आई।

          बहू ने पलट कर उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा, "लेकिन, मुझे अपनी बच्ची को दूसरी 'कृष्णा प्यारी' नहीं बनाना।"

              बुआ-दादी धक्क से रह गयी। वह तो कब का अपने अतीत को भुला बैठी थी, मगर आज तो बहू ने जैसे उन पर गर्म राख डाल दी थी। उनके भीतर दबी हुई दुख की लहर उमड़ पड़ी।

            उनका निश्छल मन और उनकी सुघड़ता देखकर ही तो उनके ससुर अपने बेटे के लिए उनका हाथ माँग कर ले गये थे, और फिर उनके उसी बेटे ने उनके साँवले रंग के कारण उन्हें सदा के लिए ठुकरा दिया था।

           वह खुद को जब्त करती वहाँ से उठकर जाने को हुई ही थीं कि बहू फिर बोल उठी, "खानदानी रंग ले लिया छोरी ने, ये न हुआ कि थोड़ा-सा रंग मेरा भी ले लेती।" 
 कहते हुए उसके गोरे-गोरे हाथ बच्ची की पीठ पर धम्म से जा पड़े।

               बच्ची बिलबिला कर रो पड़ी, साथ ही बुआ-दादी भी जोर से दहाड़ पड़ीं! "बहू, इतना भी गुमान मत कर। अपनी चमड़ी उधेड़ और मेरी भी, जरा मैं भी तो देखूँ, कहीं तेरी गोरी चमड़ी के नीचे बहते खून का रंग भी तो सफ़ेद नहीं!"


               प्रेरणा गुप्ता 


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